Thursday, August 15, 2019

रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा

श्रावण मासीय पूर्णिम चंद्र ,
छटा समेटे परलोक ताल सा ।
रेशम-धागे का स्वर्णिम रूप ,
सैरन्ध्री-गोविन्द श्वेतानुराग सा ।।

वचनों का सीधा मौन कथन ,
यथ चीर द्रौपदी दीर्घकाय सा ।
द्युति बंधन का अति उजला ,
निशदिन उगते रवि-प्रात सा ।।

बंधु-बांधवी स्नेह मनोरम ,
कोकिल गुंजन मधुर तान सा ।
भ्रातृ-भगिनी युद्ध हासप्रद ,
पशु मुख गर्जन हास्य वाण सा ।।

कुटुंब के द्वि स्तंभी धरोहर ,
एक गौरव,एक भव्य मान सा ।
गृह की शोभा दोनों से ही ,
केंद्रित तत्र मोहित बाग सा ।।

एक सूत्र में बंध अटूट बँधा ,
आत्म संयोजित ईश आस सा ।
नेह कोटि-सहस्र युगों का ,
रक्षाबंधन पर्व पवित्र काल सा ।।।


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