Wednesday, August 21, 2019

नदी किनारे बैठी मैं

नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ ।
वेग सहूँ फिर धार सहूँ  ..
उफान मचाती लय बन जाऊँ ।

उमड़-घुमड़ जो सरपट दौड़े ,
मेघ की प्यारी बरखा हूँ ..
मंदिर में जो सुगन्ध बहे ,
लोबान से उठती लपटा हूँ ..
एक फकीर की सूफी हूंँ मैं ,
किसी देह की रक्ता हूंँ ,
प्रिय की यादों में जकड़ी ,
अनुराधा हूँ, मैं मीरा हूँ ..
जीवन को ही प्रेम बनाकर
प्रीत में डूबी रस बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ, खुद जल जाऊँ।।

चढ़ते यौवन की तरूणाई ,
मेरे मन से जोड़ करे ..
वाचाल,बिखरता चित्त मेरा
जब-तब बैठे योग करे..
परिक्रमा में उस योगी के,
सुफल मेरा हर चक्रण हो..
उसकी धुरी पर चलना ,
जैसे जीवन रक्षण हो..
निर्जन वन की यात्रा में
भ्रमणी यूँ ही बन जाऊँ..
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।

छाया जब उस छलिये की
तन पर मेरे पड़ती है..
वर्ण बदलता,रूप निखरता
रात भी पूनम होती है ..
वात चले जब सौंधी सी
मुझ में वो बस 'बस' जाये..
मयूरी मोहक नृत्य-भंगिमा
काया पर मेरी रच रच जाये..
थकन भरी हर रजनी में
अँगड़ाई उसकी बन जाऊँ...
नदी किनारे बैठी मैं..
दीप जलाऊँ,खुद जल जाऊँ ।।।

3 comments:

  1. बेहतरीन भावपूर्ण रचना

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद

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    2. बहुत बहुत धन्यवाद

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