Tuesday, August 13, 2019

अग्निपरीक्षा

कहो जानकी,जनकनंदिनी ;
दी तुमने क्यों अग्नि परीक्षा ?
अड़ जाती तुम, लड़ जाती तुम ..
सहती गई क्यों प्रत्येक समीक्षा ?

चुप्पी साधे सुनती थी,
नयनों में सिंधु गुनती थी,
तोड़ के बाँध दिखा देती,
विवेचन सारे झुठला देती,
क्यों झुक गई कहो मैथिली ?
करती गई क्यों मात्र प्रतीक्षा ?

हाँ,माना ...तुम बंदी थी,पर..
दोष तुम्हारा कुछ ना था,
लक्ष्मण-रेखा पार करी थी,
कृत्य कोई यह सज्जन था,
क्यों आरोपित तुम हुई सिया ?
तुम तो थी माँ पवित्र सुदीक्षा ....

क्यों ना कहा तभी रघुवर से..
"एकाकी क्यों चलूँ आग पे?"
यह क्या हुई भई रीत भला ..
प्रजा-प्रेम में विश्वास ढहा...
वियोग सहा था दोनों ने ही,
मात्र तुम्हीं को मिली उपेक्षा ...

सत्य यही तुम संस्कारी थी ,
पतिव्रता तुम, गुणवती नारी थी,
मर्यादा पुरुषोत्तम थे वे,क्यों
उन्हें उचित यह अध्याय लगा ?
क्यों ना बदल दिया नियति को ,
क्या थी इससे उन्हें अपेक्षा ?

आदिकाल की रीति वही ,
अब भी स्त्री को दहलाती है ..
अबोध कलयुगी पीढ़ी मैया,
रमणी को ही कूटे जाती है..
अज्ञान भरा हर कुएँ में,अब
करो आवंटित तुम माँ सुशिक्षा ....

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