Thursday, May 7, 2020

समर वसुधा की तप्तता में

समर वसुधा की तप्तता में, भले किये हों तुमने द्वंद्व ।
बैठ द्वार की उष्ण छाँव में, सहती थी मैं अंतर्द्वंद्व ।।

गोली खाई जब भी तुमने, ढोया छाती पर अंगार ।
सौंदर्य निखर कर आया त्यों, सत्रहवाँ मेरा शृंगार ।।

उजड़ गई मस्तक की लाली,हुए अवर्णे कक्ष-कपाट ।
विधवा बन भी पूर्ण सुहागन, मुखड़ा मेरा रहा सपाट ।।

तेरे विजय की सुगाथा में,हुआ समर्पित है सिंदूर ।
करने अमर तेरे गात्र को, हुआ अश्रु भी मुझसे दूर ।।

तुम्हें देखकर तीन रंग में, हावी पीड़ा पर अभिमान ।
छीन लिये सब गहने तुमने, दिया अमूल्य उच्च सम्मान ।।

हुई ओढ़नी वर्ण विहीना, पायल ने खोयी झंकार ।
गौण हैं सूचक समृध्दि के, प्रधान जन-गण-मन टंकार ।।

छोड़ अकेली यशोधरा को, देकर नन्हें से उपहार ।
चले गए तुम बुद्ध मार्ग पर, खोजने राष्ट्र में परिवार ।।

दर्पण में दिखती छवि तेरी, भौंहों मध्य तेरा प्रताप ।
लक्ष्मीबाई सा हिय मेरा, ना करने देता संताप ।।

अनुगामिन बनकर तेरी मैं, पाऊँ तुमसा ही प्रतिरूप ।
रख जीवित सर्वदा स्वयं में, बनूँ प्रेम का तेरे रूप ।।

समाधि स्थल पर जाकर प्रियवर,दे आऊँ तुम्हें प्रेम पत्र।
प्रति निशा सुहागन बन तेरी,आत्म पर वारूँ आत्म छत्र ।।


8 comments:

  1. सर्वश्रेष्ठ रचना सखी❤️❤️❤️❤️बेहद हृदस्पर्शी🌺🌺🙏

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  2. नि:शब्द कर दिया इस भावपूर्ण अनुपम कृति श
    ने.... समीक्षा से परे है ये रचना 👌👌👌🙏🏻👏👏👏

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  3. बहुत ही सुंदर काव्य की रचना की है

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  4. भावपूर्ण, संयोग,वियोग,वीर सभी रसों का बेहद संजीदगी से प्रयोग। ऐसे ही आगे बढ़ते रहो।

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  5. Kya Likha hai Tumne Yaar jai hind ....🙏🙏

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  6. काव्यशाला की अध्यापिका की अनुपम कृति 🙏👌

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  7. कब तक होता रहेगा अहिंसा के देश में आतंक का ताण्डव?

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  8. Speechless Anushree...aankhe bhar ayi meri

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