जब रोकती है दुनिया उसको
नीर बहाने से,दर्द बताने से ;
तो बताना चाहता है वो कि
इस मजबूत शरीर के भीतर
एक दिल भी है,
नाजुक सा,कोमल सा ;
जहाँ कायम हैं सभी एहसास
अपनों के लिए, अपने लिए ;
वो भी टूटता है,तड़पता है
जब हासिल नहीं कर पाता
प्रेम अपना ,स्वप्न अपना;
रोना चाहता है खुल कर ,
किसी बंद कोठरी में नहीं ,
खुले आकाश तले,
बनाना चाहता है
हृदय की तस्वीर
बस कागज पर ही नहीं,
भरी महफिल में ;
फिर याद आ जाती है उसे
समाज की खोखली सत्यता
कि वो मर्द है और
'मर्द को दर्द नहीं होता'
फिर बताता है खुद को भी
"तुम रो नहीं सकते
टूटना तुम्हारी प्रकृति पर
प्रश्नचिह्न लगायेगा,
यूं रो कर कैसे खरे उतरोगे
मर्दानगी की कसौटी पर ?
बनाये रखनी है तुम्हें
इस परिभाषा की मर्यादा ।"
और इस तरह
बन जाता है वो 'असली मर्द'
समाज की बेरंग नजरों में ;
पर बंद-अंधेरी-काली कोठरी में
वो आज भी 'लड़की' ही है ,
समाज की भाषा में 'कमजोर लड़की',
जिसकी खुशियाँ,जिसके दुःख
सब आँखों से निकलते हैं,
लेकिन वो तर जाता है हर रात
'लड़की' बनकर!!!
नीर बहाने से,दर्द बताने से ;
तो बताना चाहता है वो कि
इस मजबूत शरीर के भीतर
एक दिल भी है,
नाजुक सा,कोमल सा ;
जहाँ कायम हैं सभी एहसास
अपनों के लिए, अपने लिए ;
वो भी टूटता है,तड़पता है
जब हासिल नहीं कर पाता
प्रेम अपना ,स्वप्न अपना;
रोना चाहता है खुल कर ,
किसी बंद कोठरी में नहीं ,
खुले आकाश तले,
बनाना चाहता है
हृदय की तस्वीर
बस कागज पर ही नहीं,
भरी महफिल में ;
फिर याद आ जाती है उसे
समाज की खोखली सत्यता
कि वो मर्द है और
'मर्द को दर्द नहीं होता'
फिर बताता है खुद को भी
"तुम रो नहीं सकते
टूटना तुम्हारी प्रकृति पर
प्रश्नचिह्न लगायेगा,
यूं रो कर कैसे खरे उतरोगे
मर्दानगी की कसौटी पर ?
बनाये रखनी है तुम्हें
इस परिभाषा की मर्यादा ।"
और इस तरह
बन जाता है वो 'असली मर्द'
समाज की बेरंग नजरों में ;
पर बंद-अंधेरी-काली कोठरी में
वो आज भी 'लड़की' ही है ,
समाज की भाषा में 'कमजोर लड़की',
जिसकी खुशियाँ,जिसके दुःख
सब आँखों से निकलते हैं,
लेकिन वो तर जाता है हर रात
'लड़की' बनकर!!!

Speechless and true..👏
ReplyDeleteBahot Khoob ☺️
ReplyDeleteवाहहहह गज़ब क्या व्याख्या की है आपने मर्द के दर्द की 👌🏻👌🏻🌼🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙌🏻
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