वैशाख मास शुक्ला नवमी, पुष्य का मध्य काल ।
भूमिजा वह सीता सुवर्णी, बनीं जनक का भाल ।।
लघु नूपुर के झंकृत लय से, हुआ भवन कल्याण ।
मधुरिम स्वर की शुभ गूँजों से, भरीं भीत में प्राण ।।
शनैः-शनैः तरुणाई छायी, मुख पर उगता तेज ।
काया जस पावन मधुबन सी, सुरभित कलिका सेज ।।
स्वयंवर की वह धनु परीक्षा, सफल हुए श्रीराम ।
गठबंधित विष्णु-श्री धरा पे, सिय आयीं प्रभु धाम ।।
सुहागरात्रि की अवधि छोटी, खोईं स्वर्णिम हार ।
अर्द्धांगी बन त्यागीं विभवा, स्वीकारीं वन-भार ।।
प्रिय सह भोगी पीड़ा नारी, रचा प्रेम अध्याय ।
निश्छल हो जो प्रिया हृदय से, सीता-कण कहलाय ।।
ना धुंधलाई पीर रेखा, मिला अन्य आघात ।
छल से रावण सियहरण किया,चले भयंकर वात ।।
भींगे कानन नेत्रनीर से,जलमय तीनों लोक ।
अर्द्ध तन ले प्रिय खोजें प्रिया, दिखे देह में शोक ।।
पता लगा ज्यों वैदेही का, लंक चले श्रीराम ।
किया पराजित रावण को त्यों,लाये सिय को थाम ।।
पूर्ण हुआ काल वनवास का ,हुई अवध में भोर ।
रघुवर बने अवध के राजा,पर भींगे दृग छोर ।।
चलीं जानकी पुनः विटप में, लिये गर्भ में बीज ।
अश्रु अनगिन,अनंतम पीड़ा, ना मिले सुखद तीज ।।
हाय! कैसी थी नियति उनकी, सदैव सहा बिछोह ।
धर्म निभाते हृदि को छीला, त्यागा सुख का मोह ।।
लिये जन्म लव-कुश कुटिया में,मिले महा संस्कार ।
सिय ने मूरत ऐसी गढ़ दी, रघुवंशी आकार ।।
सौंप पुत्रों को पितु छाँव में, इच्छित कीं निर्वाण ।
जिस भू से उपजीं थीं सीता, माँगीं उनसे त्राण ।।
बन गयीं वह प्रेम परिभाषा,बनीं प्रीत आधार ।
कर्म-धर्म में सिय विजित हुईं, किया जन्म साकार ।।
भूमिजा वह सीता सुवर्णी, बनीं जनक का भाल ।।
लघु नूपुर के झंकृत लय से, हुआ भवन कल्याण ।
मधुरिम स्वर की शुभ गूँजों से, भरीं भीत में प्राण ।।
शनैः-शनैः तरुणाई छायी, मुख पर उगता तेज ।
काया जस पावन मधुबन सी, सुरभित कलिका सेज ।।
स्वयंवर की वह धनु परीक्षा, सफल हुए श्रीराम ।
गठबंधित विष्णु-श्री धरा पे, सिय आयीं प्रभु धाम ।।
सुहागरात्रि की अवधि छोटी, खोईं स्वर्णिम हार ।
अर्द्धांगी बन त्यागीं विभवा, स्वीकारीं वन-भार ।।
प्रिय सह भोगी पीड़ा नारी, रचा प्रेम अध्याय ।
निश्छल हो जो प्रिया हृदय से, सीता-कण कहलाय ।।
ना धुंधलाई पीर रेखा, मिला अन्य आघात ।
छल से रावण सियहरण किया,चले भयंकर वात ।।
भींगे कानन नेत्रनीर से,जलमय तीनों लोक ।
अर्द्ध तन ले प्रिय खोजें प्रिया, दिखे देह में शोक ।।
पता लगा ज्यों वैदेही का, लंक चले श्रीराम ।
किया पराजित रावण को त्यों,लाये सिय को थाम ।।
पूर्ण हुआ काल वनवास का ,हुई अवध में भोर ।
रघुवर बने अवध के राजा,पर भींगे दृग छोर ।।
चलीं जानकी पुनः विटप में, लिये गर्भ में बीज ।
अश्रु अनगिन,अनंतम पीड़ा, ना मिले सुखद तीज ।।
हाय! कैसी थी नियति उनकी, सदैव सहा बिछोह ।
धर्म निभाते हृदि को छीला, त्यागा सुख का मोह ।।
लिये जन्म लव-कुश कुटिया में,मिले महा संस्कार ।
सिय ने मूरत ऐसी गढ़ दी, रघुवंशी आकार ।।
सौंप पुत्रों को पितु छाँव में, इच्छित कीं निर्वाण ।
जिस भू से उपजीं थीं सीता, माँगीं उनसे त्राण ।।
बन गयीं वह प्रेम परिभाषा,बनीं प्रीत आधार ।
कर्म-धर्म में सिय विजित हुईं, किया जन्म साकार ।।

बेहद खूबसूरत कविता
ReplyDeleteBahut sunder Anushree...
ReplyDeleteबहुत बढ़िया दोस्त
ReplyDeleteअद्भुत..... अति सुंदर वर्णन
ReplyDeleteनमन् है आपकी उत्कृष्ट लेखनी को🙏🏻