Saturday, June 20, 2020

पिता (हरिगीतिका छंद)

जीवन सुघर है छंद सा यह, शिल्प पक्ष हुए पिता ।
भूले दिखाना भाव तो भी, भावना लगते पिता ।।
संजीवनी सा अर्थ लेकर, वैद्य रूपी हैं पिता ।
नभ से वृहद कुछ है कहीं तो, मात्र वह जग में पिता ।।

आधार तरु का हैं स्वयं ही, शीर्ष भी बनते पिता ।
गृह नींव उनसे पुष्ट होती, छत्र भी लगते पिता ।।
बहते सदा तन में रुधिर बन, कोशिका केंद्रक पिता ।
करते प्रकाशित नेत्र मंडल, मंत्र के आगर पिता ।।

शृंगार माँ का पूर्ण उनसे , तेज उनका हैं पिता ।
माँ प्राण लगती हैं सदा ही, प्राण मारुत हैं पिता ।।
बंधन सुरक्षित है प्रसू से, डोर दृढ़ से हैं पिता ।
सब आरती में माँ बसी है, घंट ध्वनि से हैं पिता ।।

सागर लहर सा क्रोध है यदि,हैं शिवम भोले पिता ।
है नाम उनसे इस धरा पे, नाम सार्थक हैं पिता ।।
इच्छा स्वयं की त्याग देते, जागते हम में पिता ।
पूंजी समझ हमको स्वयं का, कष्ट भी भूले पिता ।।


10 comments:

  1. सुंदर सृजन दीदी.... पिता तो सर्वस्व है ,हमारे जीवन का मूल है पिता,,,,हृदयस्पर्शी सृजन

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    1. हृदय से अनंत आभार 💐💐💐

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  2. नि:शब्द ❤❤बहुत ही सुंदर रचना दोस्त 🙏🏻🌸🌸🌼🌺💐 हरिगीतिका में बहुत सुन्दर पिरोया

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    1. अनंत आभार आपका हृदय से💕💕💕💐💐💐

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  3. इस रचना की जितनी तारीफ की जाए कम है। तीसरा बन्ध तो दिल ले गया... ❤❤❤❤

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    1. बहुत सारा धन्यवाद❤️❤️❤️❤️❤️

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  4. Woow💐💐 बहुत बहुत सुंदर कविता है अनु,बहुत बधाई है,कला शिल्प भाव हर जगह से उत्कृष्ट कविता है,शुभकामनाएँ यूँ ही लिखती रहो

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    1. तुम्हें पसंद आया ,इस लिए अनंत आभार विशु💕💕💐💐

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  5. बहुत सुंदर रचना जी ...अप्रतिम ������
    पिता जी को सादर प्रणाम ❣️

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    1. अनंत आभार आपका ❤️💐

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