Saturday, March 7, 2020

वो जन्मतीं हैं

वो प्रायः मन्नतों से नहीं जन्मतीं ,
उपवासों से भी नहीं जन्मतीं ।
नहीं लगाने पड़ते फेरे बरगद के चारों ओर
उन्हें पाने के लिए,
देवी माँ से माँगना नहीं पड़ता उन्हें ।
वो स्वयं ही, यूँ ही
प्रकट हो जाती हैं ।
बिना अहंकार के, बिन बुलाई
अतिथि बन आतीं हैं ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना नियम है, प्रकृति है ।
वो जन्मतीं हैं
क्योंकि जन्मना रीति है, होनी है ।
जिस प्रकार
बिना कुछ सोचे बीज फेंक देने मात्र से
उग आती हैं पत्तियाँ,
मुस्कुराने लगते हैं प्रसून;
ठीक वैसे ही
लहलहाने लगतीं हैं वो भी
बिना किसी पूर्व योजना के ।
हो जाते हैं कुछ परिवर्तन
सूत्रों में
और आ जाती हैं वो
सुलझाने समानता-असमानता की
दुष्कर व उलझी सी गुत्थी ।
सुलझाने में घुमावदार पहेली
जाने कितनी बार
बनाती हैं अपने हृदय पर
पीड़ाओं से प्रेम की पंक्ति ।
नहीं आतीं लेकर स्वयं के लिए भाग्य
किन्तु
बन कर आतीं हैं अनगिनत संबंधों का
सौभाग्य ।
माथे के बल पर
अपना नाम नहीं लिखतीं,
हथेली पर रंगों से
अपना जीवन नहीं भरतीं ।
वो रहतीं हैं सदा उस पर्दे के पीछे,
जहाँ लिखी होती है
पुरूषों की सफलताओं की गाथा
स्वर्णिम अक्षरों में ।
वो कर जाती हैं
अविचारे-अबोले कार्य
बिना किसी पूर्व योजना के ।
बन जाती हैं खेल-खेल में
लक्ष्मीबाई ,
कलम घुमाते-घुमाते
महादेवी बन जाती हैं ।
रसोई से विद्यालय,विद्यालय से रसोई तक
दौड़ लगाने में पाती हैं नाम
हिमा दास सा ।
उड़ान भरते कल्पनाओं की
कल्पना बन जाती हैं ।
वो नहीं जन्मतीं सिद्ध करने
अपना अस्तित्व ।
वो नहीं जन्मतीं निर्मित करने
अपना कोई साम्राज्य ‌।
वो जन्मतीं हैं
पीढ़ियाँ बनाने को ।
वो जन्मतीं हैं
जन्म-अर्थ बतलाने को ।
वो बिल्कुल नहीं जन्मतीं
पूर्व योजना से,
वो जन्मतीं हैं
योजनाओं से संसार बनाने को ।

1 comment:

  1. अद्भुत शब्द संयोजन नायाब रचना🙏❤️

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