Sunday, June 9, 2019

मैं चली

लिये हाथ में लेखनी,
कुछ भाव पिरोने चली।
हृदय में बिखरे कुछ बिन्दु,
उन्हें आकार देने चली।
इच्छा है अपनों की ,
लिखूँ कुछ स्वयं की खातिर ।
जिस लेखनी से प्रेम लिखा,
गढ़ूं कोई रचना स्वयं की खातिर ।
अब मन के भावों को,
मनोहर श्रृंगार देने चली।
छोटे -छोटे सपनों को,
काव्य रूपी उपहार देने चली।

प्रतिभा नहीं विशेष मुझमें,
पर लोगों का विश्वास हूँ मैं।
कवयित्री नहीं महान कोई,
फिर भी उनके हृदय का प्यार हूंँ मैं।
स्वप्न सजाते वे मेरे भविष्य की खातिर,
आशीष लुटाते रहते हैं मेरे जीवन की खातिर ।
 क्यों तोड़ूं उनके स्वप्नों को?
 कैसे पग पीछे कर लूँ ?
क्यों मुरझाऊँ तीव्र सूर्य से?
कैसे विपत्ति से छिप लूँ?
अपनी प्रतिभा को
उच्च आकाश देने चली।
नन्हें-नन्हें तारों से आगे,
श्रेष्ठ-सुंदर स्थान देने चली ।

पिता की चाहत पुत्री महादेवी सी
जो करे शब्दों का श्रृंगार,
काव्य की भक्ति ।
यूँ फूटा काव्य का अंकुर,
शब्द पत्र पर सज गये।
कुछ रचना सुंदर
तो कुछ थोड़ी टूट गयी।
किन्तु मन का विश्वास अटल है,
सुंदर लिखते रहने का प्रयास निष्कपट है।
कुछ कर-गुजरने की अब इच्छा प्रबल है,
अब कठिनाइयों से भरी चाहे कितनी भी डगर है।
अपनी रचनाओं को अब
भव्य ताज देने चली ।
अभी नदी हूंँ छोटी -सी,
सागर अथाह बनने चली।

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