Saturday, June 15, 2019

पिता

काट कर बदन अपना
खानापूर्ति करते हैं ,
बच्चों के जीवन में ...
झंझावातों में फँस कर
टूटा करते हैं ,
सुख जोड़ते हैं
तब भी आँगन में ...
पीड़ा के दलदल में
धँसकर भी
आँसू नहीं बहाते ,
मात्र चुप्पी साध लेते हैं ..
समय के संग-संग
कठोर अधिक
हो जाते हैं ...
जागते रहते हैं
चिंतावश
निशा पहर में ...
वे पिता ही होते हैं ,
खड़े होकर वृक्ष की भाँति
सहते हैं आपदायें ,
छिपा लेते हैं
कुटुंब अपनी शाखा में ...

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