Thursday, June 20, 2019

लकीर

जीवन-मृत्यु के बीच
जो पतली सी
लकीर होती है न..
वहाँ खड़ी हूँ ,
बरसों से ...
हाथ थामते हो मेरा,
जीवटता लौट आती है ..
जीवित हो उठती हूँ ..
छुड़ा कर चल देते हो
जब हाथों को,
मृत्यु शैय्या की ओर
बढ़ने लगती हूँ ..
पुनः आ जाते हो
अमृत-पान कराने ...
बरसों से
इसी जद्दोजहद में
जूझ रही हूँ ...
ना जीती हूँ,
ना मरती,
जीवन-मरण का
चक्कर लगा
आ जाती हूँ
पुनः
उसी लकीर पर....

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