Sunday, July 12, 2020

महादेव को समर्पित (हरिगीतिका छंद)

गंगा जटा में थाम कर के,शिव प्रलय को रोकते ।
भरते शिरा में रक्त का कण ,प्राण वह ही सोखते ।।
आरंभ उनसे है धरा का, शब्द अंतिम वह हुए ।
विष को उतारे कंठ में हैं, घट सुधा का भी हुए ।।

नंदी विराजे सामने हैं, सर्प ग्रीवा पर दिखे ।
काया भभूतों से रँगी है, हस्त में डमरू रहे ।।
नाचे त्रिशूल लिये हुए ही, ध्यान में योगी हुए।
क्षण में मिले संतोष उनको, रुष्ट भी क्षण में हुए ।।

वह ही स्वयं हैं प्रेम शाला, अक्षरों में भी बसे ।
जग के प्रथम प्रेमी-वियोगी, प्रेम की भाषा रचे ।।
की है प्रतीक्षा युग-युगों तक,पीर में कितना जले ।
पाकर पुनः अपनी प्रिया को, रुद्र से भोले बने ।।

उपवास श्रावण का फलित है, शिव सजाते भाग्य हैं ।
देते उसे संयोग का वर , जो यहाँ वैराग्य है ।।
संन्यास में जिसका रमा मन, स्थिर हिया उसको मिला ।
माँगा शिवम से जो निलय सुख, वह हरित जीवन जिया ।।

हूँ पूजती उनको हृदय से, वह हृदय को शिव किये ।
हूँ बोलती शिव शिव सदा ही, बोल को शिव शिव किये ।।
आराधना उनकी करूँ अब, श्वास को भी तोड़ के ।
उनके चरण में धाम माँगूं , अंजुरी को जोड़ के ।।
©अनुश्री 'श्री'✍️


4 comments:

  1. वाहहहह.... हृदयस्पर्शी छंदबद्ध शिवस्तुति... मनोरम व प्रशंसनीय शब्दचयन...👌👌👌👌

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  2. बेहद सुंदर👌👌👌👌👌अनुश्री बहुत प्यारी रचना हुई है,कई दिन बाद कुछ पढ़ने को मिला,शुक्रिया
    भगवान शूलपाणि पर आपने बहुत कमाल लिखा

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  3. बोल को शिव शिव किये...👌👌👌👌👌
    वाह उच्च कोटि की रचना है ये। व्याकरण के साथ साथ इतने सुंदर भाव मतलब कमाल ही कर दिया अनु बहुत अच्छी रचना ❤❤❤❤❤❤❤

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